नारायण नागबली पूजा विधि
नारायण नागबली पूजा एक तीन दिवसीय वैदिक अनुष्ठान है, जिसमें मुख्य रूप से दो प्रमुख पूजाएं शामिल होती हैं—पहली नारायण बली पूजा और दूसरी नाग बली पूजा। इन दोनों पूजाओं के उद्देश्य अलग-अलग होते हैं, लेकिन इन्हें तीन दिनों में क्रमबद्ध रूप से संपन्न किया जाता है। इस धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत परिवार के पुरुष सदस्यों द्वारा की जाती है। सबसे पहले त्र्यंबकेश्वर मंदिर में जाकर भगवान महादेव की पूजा-अर्चना की जाती है, जो समस्त सृष्टि के स्वामी माने जाते हैं। इसके पश्चात पंडित जी द्वारा पूजा की सभी आवश्यक तैयारियां की जाती हैं और देवताओं की स्थापना की जाती है।
त्र्यंबकेश्वर में नारायण नागबली पूजा का पहला दिन
पहले दिन शुभ कार्य की शुरुआत करने के लिए, पूजा कराने वाले व्यक्ति को कुशावर्त कुंड में पवित्र स्नान करने के लिए कहा जाता है। इस दिन हल्के और शुभ रंग के वस्त्र पहनना उचित माना जाता है तथा काले और हरे रंग के वस्त्रों से बचना चाहिए। स्नान के बाद पहने जाने वाले कपड़े नए होने चाहिए। इसके बाद त्र्यंबकेश्वर मंदिर में जाकर भगवान महादेव के दर्शन और पूजा की जाती है, जहां भक्त अपने जीवन में शांति प्राप्त करने की कामना करते हैं। इसके पश्चात, पूजा कराने वाला व्यक्ति पंडित जी के साथ अहिल्या गोदावरी संगम पहुंचता है, जहां नारायण नागबली पूजा की मुख्य विधि प्रारंभ होती है। आगे की सभी विधियों का संचालन पंडित जी द्वारा किया जाता है।
पूजा के दौरान दो पात्रों में देवताओं की स्थापना की जाती है—एक में भगवान विष्णु और दूसरे में यमराज। इसके बाद मुख्य संकल्प (प्रधान संकल्प) लिया जाता है। पूजा की विधि में संकल्प, न्यास और कलश पूजन शामिल होते हैं। पंडित जी पूर्व दिशा में एक पात्र स्थापित करते हैं और दक्षिण दिशा में कुश (दर्भा) को व्यवस्थित करते हैं। इसके बाद जल छिड़काव और वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से भगवान गणेश, सूर्य देव और भगवान विष्णु का आवाहन किया जाता है। इसके पश्चात पंडित जी हिंदू धर्म के प्रमुख पांच देवताओं—भगवान ब्रह्मा, भगवान महेश (शिव), भगवान विष्णु, प्रेत और यमराज की स्थापना करते हैं।
इसके बाद क्रमशः कई महत्वपूर्ण पूजन किए जाते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- अग्नि स्थापना
- एकादशी विष्णु श्राद्ध
- पिंडदान (पराशर विधि)
- पुरुषसूक्त हवन
- पलाश विधि
- पंचदेव श्राद्ध बलिदान
इन सभी अनुष्ठानों का मुख्य उद्देश्य मृत आत्मा को प्रकाश की ओर अग्रसर करना और उसे ईश्वर के चरणों में स्थान प्राप्त कराने में सहायता करना है।
नीचे अधिकृत गुरूजियों की सूची दी गई है, जिनके पास ताम्रपत्र है और जो त्र्यंबकेश्वर पुरोहित संघ (पंजीकरण क्रमांक F-352) द्वारा प्रमाणित हैं। आप इस सूची में से किसी भी पंडितजी से संपर्क कर सकते हैं।
पहले दिन किए जाने वाले पूजन के बारे में विस्तृत जानकारी
अग्नि स्थापना (Agni Sthapana):
किसी भी देवता का आवाहन करने से पहले “अग्नि” अर्थात देवताओं की अग्नि को हवन में आमंत्रित किया जाता है। हवन मंडप में अग्नि प्रज्वलित की जाती है और अग्नि मंत्रों का उच्चारण किया जाता है। यह हिंदू धर्म में किसी भी हवन का पहला चरण होता है। माना जाता है कि अग्नि भक्तों और देवताओं के बीच एक दिव्य सेतु का कार्य करती है। अग्निकुंड की ज्वालाएं दिव्यता का प्रतीक मानी जाती हैं।
एकादशी विष्णु श्राद्ध (Ekadashi Vishnu Shradh):
एकादशी का दिन पितृ श्राद्ध के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे मृत आत्मा को प्रकाश की प्राप्ति और मोक्ष मिलता है। इस विधि में पंडित द्वारा विधिपूर्वक श्राद्ध किया जाता है, जिसमें गंगाजल, दही, रूई, गुड़, तुलसी पत्र, जौ, घी, कपूर, चावल, रोली, सुपारी, रक्षा सूत्र, जनेऊ, हल्दी, मिट्टी का दीपक और काले तिल आदि का उपयोग किया जाता है।
पुरुष सूक्त हवन (Purusha Suktam Havan):
जिस स्थान पर धार्मिक अनुष्ठान किया जा रहा है, उसे पहले गोबर से लीपकर शुद्ध किया जाता है और एक रेखा खींची जाती है। इसके बाद थोड़ी मिट्टी और पवित्र जल छिड़का जाता है। फिर वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए हवन किया जाता है। यह सभी पूजन, हवन और श्राद्ध विधियां पंडित द्वारा पूजा कराने वाले व्यक्ति की उपस्थिति में संपन्न की जाती हैं।
पलाश विधि (Palash Vidhi):
यह विधि उन परिस्थितियों में की जाती है, जब मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार पूर्ण रूप से नहीं हो पाया हो। जैसे—कोई व्यक्ति लापता हो गया हो और उसके जीवित लौटने की संभावना न हो, या महामारी के कारण शव परिवार को न मिल पाया हो। इस विधि में पलाश के फूलों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें अत्यंत पवित्र माना जाता है और ये लक्ष्मी देवी को अर्पित किए जाते हैं।
पिंडदान (पराशर विधि) (Pind Daan Parashar):
सामान्यतः पिंडदान पितृ पक्ष के दौरान किया जाता है, जो 16 दिनों की अवधि होती है। यह मृत आत्मा को शांति प्रदान करने और उसकी अधूरी इच्छाओं को शांत करने में सहायक होता है, जिससे आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। पहले दिन की संपूर्ण पूजा देवताओं का आवाहन करने और उन्हें आमंत्रित करने के लिए समर्पित होती है, ताकि वे मृत आत्मा को शांति प्रदान करने में सहायता करें। यह अनुष्ठान की शुरुआत होती है, जो तीसरे दिन पूर्ण होती है।
त्र्यंबकेश्वर में नारायण नागबली पूजा का दूसरा दिन
दूसरा दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस दिन पूजा प्रारंभ करने वाला परिवार का पुरुष सदस्य पुनः कुशावर्त कुंड में पवित्र स्नान करता है और वही वस्त्र धारण करता है जो उसने पहले दिन पहने थे। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पहले दिन प्राप्त हुई आध्यात्मिक ऊर्जा और आभा बनी रहे। इसके बाद पंडित जी सबसे पहले भगवान विष्णु और फिर भगवान ब्रह्मा का आवाहन करते हैं। परंपरा के अनुसार भगवान ब्रह्मा का आवाहन विषम क्रम (पहला, तीसरा, पांचवां) में किया जाता है।
इसके पश्चात मंत्रोच्चार के साथ सभी देवताओं को क्रमवार पिंड अर्पित किए जाते हैं। यह क्रम इस प्रकार होता है:
- भगवान महादेव
- भगवान ब्रह्मा
- भगवान शिव
- यमराज
पांचवां पिंड भगवान विष्णु के माध्यम से मृत व्यक्ति को अर्पित किया जाता है। इस समय ब्राह्मणों को वस्त्र, आभूषण, सोना या गौदान देना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके बाद पंडित जी तिल, विदर्भ (दर्भा) और तुलसी युक्त पवित्र जल पूजा करने वाले व्यक्ति के हाथों में डालते हैं, जिससे वह देवताओं को अर्पित कर सके। इसी के साथ दूसरे दिन की पूजा संपन्न होती है।
त्र्यंबकेश्वर में नारायण नागबली पूजा का तीसरा दिन
तीसरे और अंतिम दिन भगवान गणेश की पूजा की जाती है, ताकि मृतक के परिवार को नई शुरुआत के लिए आशीर्वाद प्राप्त हो। भगवान गणेश को हर शुभ कार्य के आरंभ में पूजा जाता है, जिससे समृद्धि, बुद्धि और सभी बाधाओं का नाश होता है। इस दिन स्वस्ति पुण्याहवाचन किया जाता है। “स्वस्ति” शब्द “स्व” और “अस्ति” से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है समृद्धि और कल्याण। इस दौरान पंडित जी स्वस्ति मंत्रों का उच्चारण करते हैं और परिवार के लिए सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
स्वस्ति पुण्याहवाचन मंत्र:
“स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः, स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पति दधातु, ॐ शांति शांति शांति॥”
अंतिम दिन पंडित जी सर्प की एक छोटी प्रतिमा की पूजा करते हैं, जिसे बाद में परिवार के सदस्य पंडित जी को दान करते हैं। इसके पश्चात सभी ब्राह्मण और पूजा में शामिल लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। अंत में सभी के लिए अच्छे स्वास्थ्य, सफलता और समृद्धि की कामना की जाती है। यह माना जाता है कि इस पूजा के प्रभाव से जीवन से दुर्भाग्य दूर होता है और पितृ दोष का निवारण होता है। नारायण नागबली पूजा एक ऐसा अनुष्ठान है, जो केवल एक व्यक्ति द्वारा करने पर भी पूरे परिवार के लिए लाभकारी होता है। यह परिवार के सभी सदस्यों के जीवन में शांति, संतोष और समृद्धि लाने में सहायक होता है।